शनिवार, 19 जुलाई 2008

खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के .........( ग़ज़ल )

खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के !
थे वहीं पर बहुत पेड़ कचनार के !!

आरहा है घटाओं का मौसम मगर !
झेल थोड़े से तेवर भी अंगार के !!

इक थपेडे ने आकर कहा नाव से !
कितने थोथे भरोसे हैं पतवार के !!

डूबना ही मुकद्दर में जब तय हुआ !
देखलें हौसले हम भी मझधार के !!

फेर लेते हैं नज़रें मुझे देखकर !
क्या अनौखे हैं अंदाज़ दीदार के !!

आप जिनको मशालें समझते रहे !
हाथ में झुनझुने थे पुरस्कार के !!

देखते हो सदा क्यों कड़क बिजलियाँ ?
देखना सीख झोंके भी बौछार के !!

सर के बदले में मंहगी नहीं ज़िंदगी !
तुमको आते नहीं ढंग व्यापार के !!

मंजिलें हैं कहाँ ये पता ही नहीं !
सिर्फ़ आदी हुए लोग रफ़्तार के !!


© 2002 Lalit Mohan Trivedi All Rights Reserved