रविवार, 14 जून 2009

वहीं तक पाँव हैं मेरे .......( ग़ज़ल )

ग़ज़ल
..........................


वहीं तक पाँव हैं मेरे ,जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है ,यही जादूगरी मेरी !!


हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे ,किताबों में धरी मेरी ?


खरी तो सुन नहीं सकते ,किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी ,शायद मसखरी मेरी !!


निशाना जो तेरा बेहतर ,नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और ,बजेगी खंज़री मेरी !!

 खुलकर हंस सका ना रो सका राहे-मोहब्बत में ! 
यहाँ भी आ गई आड़े , अकलमंदी मरी मेरी  !!    


ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!


तुम्हें फ़िर हो हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!


© 2008 lalit mohan trivedi All Rights Reserved

25 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

ललितमोहन जी
बहुत बढ़िया गजल है . पढ़कर आनंद आ गया . धन्यवाद.

mehek ने कहा…

तुम्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!

waah bahut hi umda behtarin gazal,bahut dino baad sunder gazalpadhne mili,badhai.

ओम आर्य ने कहा…

achchhi rachana ..........achchhi bhawabhiwyakti

दीपक भारतदीप ने कहा…

क्या बात है त्रिवेदी जी! मजा आ गया।
दीपक भारतदीप

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया!!

venus kesari ने कहा…

वहीं तक पाँव हैं मेरे ,जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है ,यही जादूगरी मेरी !!

मतले ने तो दिल लूट लिया

वीनस केसरी

Shama ने कहा…

Lalitji, aap ko padh rahe hote hain, lagta hai,aur padhte chale jaay, aur rachna mukammal ho jaatee hai...
Aapki rachnayen, apni maa ko padhke suna rahee thee..achhee urdudaan hain...behad pasand aayee unhen! Unki orsebhi badhayi!

Mere "sansmaran" blogpe aapne jo tippanee dee, padhke, mai khud abhibhut ho gayi...aapki zarranawazi aur hausla afzayike liye shukriya!
Aasha karti hun, any lekhanbhi aapko pasand aayega..
Aapki sanjeedaa tippaniyon ka hamesha intezar rehta hai....wobhi ek hunar hai,jo seekhna chahiye...
snehsahit
shama

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बढिया है......

vandana ने कहा…

sabse hatkar likhi gayi gazal.......har sher lajawaab.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!

वाह वाह....! आप जब लिखते हैं बेहतरीन लिखते हैं.....!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

म्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी

lalit mohan जी........... लाजवाब shayeri ... khoobsoorat ग़ज़ल है....हर शेर jeevn के रंग से bhara है.....bahatreen likha hai

मैथिली गुप्त ने कहा…

बहुत खूब ललित मोहन जी, बहुत खूब
लेकिन ज़रा जल्दी जल्दी आया कीजियेगा साहब

SWAPN ने कहा…

wah lalit ji, bahatareen rachna,

............. bansuri meri, wah. badhai sweekaren.

संजीव गौतम ने कहा…

दादा प्रणाम
बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है...
वहीं तक पांव हैं मेरे, जहां तक है दरी मेरी.
इसी मैं सब समेटा है, यही जादूगरी मेरी.
मतला बहुत आला दर्जे का है.
और ये शेर...
ये जिद भी है...हरी मेरी.
और ये भी...तुम्हें फिर हो....बांसुरी मेरी.
बहुत बहुत बहुत अच्छे हैं.

गौतम राजरिशी ने कहा…

सुभानल्लाह सर....बेमिसाल ग़ज़ल

मतला तो बस कयामत बरपाता हुआ है।
"बचेगी पाँखुरी कैसे ,किताबों में धरी मेरी" और "पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी" इन दो मिस्‍रों पे तो हम बिछ गये है गुरूवर!!

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

आप सबसे मिले इस स्नेह से गदगद हूँ मैं , आभारी भी ! बहुत बहुत धन्यवाद !

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... पूरी गजल प्रभावशाली है लेकिन कुछेक शेर बेहद प्रसंशनीय हैं !!!!!

Shama ने कहा…

Kya ap any kahaniyaan padh paye hain?

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Shama ने कहा…

Aapkee rachnaayen to mai lagataar padhtee hun..nayee rachnaon kaa hamesha intezaar eheta hai..!
Aakee tippanee ke tahe dilse shukriyaa..ye hausala afzaaree aur zarra nawaazee hai, warna mai, rachnaa kaar nahee..ek adnaa-see wyaktee hun, jo mankee baat likh detee hun...

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Shama ने कहा…

आपकी ," सासू माँ -एक संस्मरण ",पे दी गयी टिप्पणी के लिए तहे दिलसे शुक्रगुज़ार हूँ ...!

नयी पुरानी सारी रचनाएँ पढ़ चुकी हूँ ..आप कब और लिखेंगे ? इन्तेज़ार रहता है ..एक गज़ब लयबद्धता होती है ,आपकी रचनाओं में ..उसे गुन गुनाके पढने का मन करता है ..!

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"अर्श" ने कहा…

ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!

YE SHE'R ITNAA MUKAMMAL HAI KE ISKE BAARE ME KAHANE KE LIYE KUCHH NAHI HAI MERE PAS... KOI SAJAAWAT NAHI HAI IS SHE'R ME AUR JITANI KHUSURATI SE AAPNE KAHI HAI WO APNE AAP ME KABLIYAT WAALI BAAAT HAI ... WAKAI USTADANA SHE'R HAI YE ... UPAR SE MATALAA TO ALAG SE KHADE HOKAR DAAD MAANG RAHAA HAI... BAHOT BAHOT BADHAAYE LALIT MOHAN JI ... SALAAM AAPKI LEKHANI KO IS KALAAM KE LIYE...




ARSH

apnesapne ने कहा…

तुम्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!

very nice sir....

अर्चना गंगवार ने कहा…

ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!

bahut khoob

Luthra Yogesh ने कहा…

wah wah wah

ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!

Madan Saxena ने कहा…

तुम्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी बहुत शानदार ग़ज़ल शानदार भावसंयोजन हर शेर बढ़िया है आपको बहुत बधाई

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