( रसिया )
कैसौ आयौ नवल बसंत सखी री मोरे आंगन में !
पोर पोर में आस , प्यास भर गयौ उसाँसन में !!
धरा नें ऐसौ करौ सिंगार !
चुनर सतरंगी , पचलड़ हार !
रसीले नैनन में कचनार !
अंग अंग अभिसार झरै, ठसकौरी दुलहन में ....
कैसौ आयौ ..............
उडे गालन पै लाल अबीर !
हो गई पायलिया मंजीर !
छनकती फिरै जमुन के तीर !
सखि मुंडेर पै कागा बोलै, कोयलिया मन में .
कैसो आयौ...............
चटख रह्यौ कली कली कौ अंग !
फली की देह भई मिरदंग !
नवल तन हूक और हुरदंग !
पिया संदेसौ पढे ननदिया काजर कोरन में ....
कैसो आयौ............
चढौ ऐसो टेसू कौ रंग !
जोगिया बन गए पिया मलंग !
बिलम गई फाग आग के संग !
मैं वासंती चुनर निहारत रह गई दरपन में ....
कैसो आयौ ..........
© 1992 Lalit Mohan Trivedi All Rights Reserved
सोमवार, 2 फ़रवरी 2009
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