शनिवार, 9 मई 2009

खूब पता था वो सागर है खारा पानी है ......( गीत )

थोड़ी फुर्सत हो तो ही पढियेगा ,आग्रह है मेरा !इस आपाधापी और प्रतिस्पर्धा के युग में" हम जीवन कैसे जीते हैं और कैसे जीना चाहिए "के बीच सेतु तलाशती एक रचना !


गीत


खूब पता था वो सागर है खारा पानी है !
फिर भी प्यास बुझाने पहुंचे ये हैरानी है !!


बहुत दूर तक सन्नाटों ने राह नहीं छोड़ी
लेकिन हमने मीठे सुर की चाह नहीं छोड़ी

उधर नियति की और इधर अपनी मनमानी है .............


जीवन भर अपनी शर्तों पर जिसको जीना है
मीरा या सुकरात हलाहल उसको पीना है

सर कटवाकर जीने की हठ हमने ठानी है ................


बहुत कसे तारों को थोड़ा ढीला होना था
ढीले तारों को थोड़ा ठसकीला होना था

सुर के साथ हमेशा हमने की नादानी है ..................


आसमान को छू लेने की आस लगाली है
हमने बैठे ठाले अपनी प्यास बढाली है

छाया को कद समझ लिया है उस पर ज्ञानी है ?..........


अँजुरी भर अनुराग मिला तो आँगन सजा लिया
चुटकी भर वैराग मिला तो ओढा बिछा लिया

माया पूरी की पूरी तो हाथ आनी है ...................


ना तो गोताखोर बने ,जल में गहरे उतरे
फ़िर भी सागर की बातें करने से नहीं डरे

अपने साथ सही, लेकिन यह बेईमानी है ...............


दौड़ रहे है लोग भला हम क्यों रह जांय खड़े ?
यही सोचकर, जाने कितने ,अंधे, दौड़ पड़े

फ़िर इसको विकास कहते है ,अज़ब कहानी है ............


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