बुधवार, 15 जुलाई 2009

ढोते ढोते उजले चेहरे .....( ग़ज़ल )

ग़ज़ल ..........( भूली बिसरी .....)


ढोते ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर !
अब तो एक गुनाह करेंगे ,पछता लेंगे जीवन भर !!


वो रेशम से पश्मों वाला, था तो सचमुच जादूगर !
मोर पंख से काट ले गया , वो मेरे लोहे के पर !!


उसको अगर देखना हो तो , आंखों से कुछ दूर रखो !
कुछ भी नहीं दिखाई देगा , आंखों में पड़ गया अगर !!


प्यास तुम्हारी तो पोखर के , पानी से ही बुझ जाती !
किसने कहा तुम्हें चलने को ,ये पनघट की कठिन डगर !!


ज्ञान कमाया जो रट रट कर , पुण्य कमाए जो डरकर !
उसकी एक हँसी के आगे ,वे सबके सब न्यौछावर !!


सिर्फ़ बहाने खोज रहा है , पर्वत से टकराने के !
बादल भरा हुआ बैठा है , हो जाने को झर झर झर !!


और भटकने दो मरुथल में , और चटखने दो तालू !
गहरी तृप्ति तभी तो होगी , गहरी होगी प्यास अगर !!



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