बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

टूट पायेंगे नहीं पत्थर ज़रा सी चोट से .........( गीत )

टूट पायेंगे नहीं पत्थर, ज़रा सी चोट से !
ये उड़ाने ही पड़ेंगे, भूमिगत विस्फोट से !!


जो ' विचारों ' का मसीहा था 'बिचारा ' हो गया है !
जिसको होना था भँवर ,वो ही किनारा हो गया है !
हम धरा को कोसते हैं, अंकुरण देती नहीं ,
क्यों नहीं कहते कि ये बादल नकारा हो गया है !

यदि ज़मीं को खोदकर पानी निकालोगे नहीं ,
छीन लेगा तो ये शबनम भी तुम्हारे होठ से !!
ये उड़ाने ही ..........................................


है महाभारत मगर अब कृष्ण भी खाली नहीं है !
और अब गाण्डीव में भी बात कल वाली नहीं है !
द्रौपदी ने केश तो खोले हैं पर सहमी हुई है ,
भीम में आक्रोश तो है किंतु बलशाली नहीं है !

भीष्म भी अन्याय का ही साथ देने तुल गए, तब
सामने करलो शिखण्डी , बाण मारो ओट से !!
ये उड़ाने ही ...........................................