शनिवार, 20 सितंबर 2008

पहने लाख गेरुआ बाने..........( गीत )

हम सभी कोई न कोई लबादा ओढे हुए हैं और धीरे धीरे यही लबादा हमें सत्य लगने लगता है ! हमारी वासनाएं छूटती नहीं हैं सिर्फ़ वेश बदल लेती हैं ,एक नया लबादा ओढ़ लेती हैं और इसी को हमारे अन्दर बैठा हुआ जोगी परम सत्य मानकर आत्म मुग्ध होता रहता है !इसी आत्म मुग्धता को तोड़ती एक रचना .........

पहने लाख गेरुआ बाने !
जोगी का मन नहीं ठिकाने !!
पहले दौड़ भोग की खातिर !
अब है दौड़ मुक्ति को पाने !!

तप करते युग बीत चला है
और उमर घट रीत चला है
कभी रती तो कभी आरती
छलते छलते स्वयम छला है

मुदी पलक में अभी ललक है !
रम्भा आई नहीं रिझाने !!
जोगी का मन .....................

तृष्णा ने बदला है चोला
घर छोड़ा तो आश्रम खोला
खुल पायीं पर नहीं गठानें
झोली नहीं बन सका झोला

रमता अगर कहीं भी मन तो
आता धूनी नहीं रमाने
जोगी का मन .....................

हम जोगी हैं या बंजारे
मुक्ति और भटकन के मारे
हमको फुरसत कहाँ कि देखें
कौन खड़ा है भुजा पसारे

पहले सब पाने को आतुर
अब पागल है सब ठुकराने
जोगी का मन .....................

बादल गहरे भर जाने थे
बिन टकराए झर जाने थे
मन होता मर जाने का तो
शुभ आशीष अखर जाने थे

लेकिन हमने तो मढ़वाकर
रक्खे हैं पदचिन्ह पुराने
जोगी का मन ....................


© 2002 Lalit Mohan Trivedi All Rights Reserved

9 टिप्‍पणियां:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

बहुत सच्ची और अच्छी रचना !

pallavi trivedi ने कहा…

हम जोगी हैं या बंजारे
मुक्ति और भटकन के मारे
हमको फुरसत कहाँ कि देखें
कौन खड़ा है भुजा पसारे

पहले सब पाने को आतुर
अब पागल है सब ठुकराने
जोगी का मन .....................

bahut sundar...aap aadhyatmik bhi likhte hain ,ye bhi pata chala.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर-उम्दा रचना!!

मीत ने कहा…

बहुत अच्छी रचना... बहुत सही बात.

Parul ने कहा…

रमता अगर कहीं भी मन तो
आता धूनी नहीं रमाने
.......लेकिन हमने तो मढ़वाकर
रक्खे हैं पदचिन्ह पुराने
bahut sundar!!!mun kabhi aisa kabhi vaisa

Advocate Rashmi saurana ने कहा…

bhut badhiya rachana. likhte rhe.

Deepak ने कहा…

kya baat hai bhai ji,
purana loha nai dhar le damak raha hai
kabhi rati to kabhi aarti wonderful pattern shown.
must be appriciated.
thanks to blog, pakad ker likhwa to raha hai,
hardik shubhkamnayen.
bhoopendra

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

मुदी पलक में अभी ललक है !
रम्भा आई नहीं रिझाने !!

मन होता मर जाने का तो
शुभ आशीष अखर जाने थे

waah....achambhit hu.n ki ye blog pahale kaise nahi dekha... aur bilkul vahi bhav aye mere man me.n jo aapne mere blog par likha hai...! sundar..! ise len den ka vyavhaar mat samjhiyega, jab tak man waah na bole mai taarif nahi kar paati. lekin yaha.n man ko sundar lage bhav..!

उम्मीदों का आसमान ने कहा…

Mamaji Richa bhi likhne lagi hai apki tippanni bahut jariri hai.