सोमवार, 29 सितंबर 2008

तूने भी ज्यादती बनाने वाले मुझसे की... ( गीत )

पावों में जंजीर, दौड़ की इच्छा मन भर दी !
तूने भी ज्यादती बनाने वाले , मुझसे की !!

जीवन में सब थोड़ा थोड़ा
ये संस्कार उमर भर ओढा
रस की बूँदें तो छलकायीं
लेकिन कसकर नहीं निचोडा

मीरा की झांझर जैसा मन , व्यापारी सा जीवन !
ऊपर से ढाई आखर की भाषा मन भर दी !!
तूने भी ज्यादती ......................

मौसम सर्द , हवाएं तीखीं
नभ असीम , अरु गीली पंखियाँ
फ़िर भी साथ निभायीं मैंने
उजला मन , कजरारी अखियाँ

फिसलन भरी राह पर चलना , वैसे क्या कम था !
जो कबीर की साफ़ चदरिया , मेरे सर धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................

गहरी प्यास समंदर खारे
भटक मरा हूं द्वारे द्वारे
फ़िर भी अहम् न टूटा इतना
जो नदिया से हाथ पसारे

सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................

© 2002 Lalit Mohan Trivedi All Rights Reserved

10 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

bahut sundar panktiyan hain.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !"

बहुत खूब!

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

पावों में जंजीर, दौड़ की इच्छा मन भर दी !
तूने भी ज्यादती बनाने वाले , मुझसे की !!

जीवन में सब थोड़ा थोड़ा
ये संस्कार उमर भर ओढा
रस की बूँदें तो छलकायीं
लेकिन कसकर नहीं निचोडा

kya aat hai
फिसलन भरी राह पर चलना , वैसे क्या कम था !
जो कबीर की साफ़ चदरिया , मेरे सर धर दी !!
waah waah waah

सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
bahut khub ji...! bahut khoob....!

Aniruddh ने कहा…

सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................
Ati uttam

Richa Sharma ने कहा…

सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................
Kya baat hai...

दीपक भारतदीप ने कहा…

सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
----------------
क्या बात है त्रिवेदी जी! मजा आ गया!
दीपक भारतदीप

एस. बी. सिंह ने कहा…

गहरी प्यास समंदर खारे
भटक मरा हूं द्वारे द्वारे
फ़िर भी अहम् न टूटा इतना
जो नदिया से हाथ पसारे

एक शेर याद आ गया ---
कमज़र्फ़ नहीं हूँ के मैं मांग के पी लूँ
पर ये भी नहीं है ऐ मुझे प्यास नहीं है।

सुंदर भाव

pallavi trivedi ने कहा…

फिसलन भरी राह पर चलना , वैसे क्या कम था !
जो कबीर की साफ़ चदरिया , मेरे सर धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................

वाह...बहुत ही उम्दा कविता है! मानना पड़ेगा आपकी लेखन क्षमता को!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाह वाह बंधुवर
अच्छी रचना
साधुवाद

vandana ने कहा…

bahut hi khoobsoorat panktiyan