पावों में जंजीर, दौड़ की इच्छा मन भर दी !
तूने भी ज्यादती बनाने वाले , मुझसे की !!
जीवन में सब थोड़ा थोड़ा
ये संस्कार उमर भर ओढा
रस की बूँदें तो छलकायीं
लेकिन कसकर नहीं निचोडा
मीरा की झांझर जैसा मन , व्यापारी सा जीवन !
ऊपर से ढाई आखर की भाषा मन भर दी !!
तूने भी ज्यादती ......................
मौसम सर्द , हवाएं तीखीं
नभ असीम , अरु गीली पंखियाँ
फ़िर भी साथ निभायीं मैंने
उजला मन , कजरारी अखियाँ
फिसलन भरी राह पर चलना , वैसे क्या कम था !
जो कबीर की साफ़ चदरिया , मेरे सर धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................
गहरी प्यास समंदर खारे
भटक मरा हूं द्वारे द्वारे
फ़िर भी अहम् न टूटा इतना
जो नदिया से हाथ पसारे
सर तो झुक जाने को आतुर , छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
तूने भी ज्यादती ...................
© 2002 Lalit Mohan Trivedi All Rights Reserved
सोमवार, 29 सितंबर 2008
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