ग़ज़ल
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वहीं तक पाँव हैं मेरे ,जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है ,यही जादूगरी मेरी !!
हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे ,किताबों में धरी मेरी ?
खरी तो सुन नहीं सकते ,किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी ,शायद मसखरी मेरी !!
निशाना जो तेरा बेहतर ,नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और ,बजेगी खंज़री मेरी !!
न खुलकर हंस सका ना रो सका राहे-मोहब्बत में !
ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!
तुम्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!
© 2008 lalit mohan trivedi All Rights Reserved
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वहीं तक पाँव हैं मेरे ,जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है ,यही जादूगरी मेरी !!
हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे ,किताबों में धरी मेरी ?
खरी तो सुन नहीं सकते ,किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी ,शायद मसखरी मेरी !!
निशाना जो तेरा बेहतर ,नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और ,बजेगी खंज़री मेरी !!
न खुलकर हंस सका ना रो सका राहे-मोहब्बत में !
यहाँ भी आ गई आड़े , अकलमंदी मरी मेरी !!
ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!
तुम्हें फ़िर हो न हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!
© 2008 lalit mohan trivedi All Rights Reserved
