रविवार, 14 जून 2009

वहीं तक पाँव हैं मेरे .......( ग़ज़ल )

ग़ज़ल
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वहीं तक पाँव हैं मेरे ,जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है ,यही जादूगरी मेरी !!


हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे ,किताबों में धरी मेरी ?


खरी तो सुन नहीं सकते ,किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी ,शायद मसखरी मेरी !!


निशाना जो तेरा बेहतर ,नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और ,बजेगी खंज़री मेरी !!

 खुलकर हंस सका ना रो सका राहे-मोहब्बत में ! 
यहाँ भी आ गई आड़े , अकलमंदी मरी मेरी  !!    


ये जिद भी है कि अपना बीज , मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है , होती नहीं धरती हरी मेरी !!


तुम्हें फ़िर हो हो लेकिन , मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै , भारी बाँसुरी मेरी !!


© 2008 lalit mohan trivedi All Rights Reserved