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शनिवार, 15 जनवरी 2011

अलविदा .....कभी हम मीत रहे

---- गीत ----



थमना तुमको स्वीकार न था , रफ़्तार न रास मुझे आई !
तुमने चाहा विस्तार और , मैंने चाही थी गहराई !!



उड़ने की चाह न थी मुझको , तुम रहे डूबने से डरते !
धरती ही अपने बीच न थी , बतलाओ पाँव कहाँ धरते !
पानी पर लिक्खे समझौतों की, उम्र भला कितनी होती ,
कैसे निभ पाती साथ साथ , मेरी जिद तेरी निठुराई !


तुमने चाहा विस्तार.....................................


पाकर उन्मुक्त गगन को भी , तुम खुश न हो सके थे मन में !
अपनी पहचान गंवाकर भी , हम आनंदित थे बंधन में !
इसको खुद्दारी कहूँ या कि , अभिमान मगर सच तो ये है ,
तुम कच्चे धागे ला न सके , ज़ंजीर न बांध मुझे पाई !!


तुमने चाहा विस्तार ....................................................


मैं दोष तुम्हें भी कैसे दूँ , सब अपनी धुन के मतवाले
तुम खन खन खन के अनुयायी , हम छन छन छूम छनन वाले !
इसलिए रेत और चरण चिन्ह , आ करें विसर्जित लहरों में ,
जिद में तेरे भी जले पंख , मैं भी न भंवर से बच पाई !


तुमने चाहा विस्तार...............................................