(अहंकार सब कुछ पाकर भी खुश नहीं होता और प्रेम सब कुछ देकर भी आनंदित होता है ! अहंकार और प्रेम दौनों अपनों पर ही चोट करते हैं जैसे नदी अपने विस्तार के लिए अपने ही किनारों को काट देती है जबकि नदी का अस्तित्व ही किनारों से है ! यदि किनारे न हों तो कोई भी जलराशि नदी कभी नहीं बन पाएगी , बिखर जाएगी ! जो किनारे नदी को गहराई देते हैं उन्हें ही काटकर नदी इतराती है ! इसी नदी , नाव, प्रतीक को लेकर मेरी यह कविता है ' अंहकार ' ! )
चाहता हूँ आपकी थोडी सी फुर्सत और थोड़ा सा ध्यान .....
धार कटकर पत्थरों के पार क्या जाने लगी !
वो नदी गुमनाम सी अब और इतराने लगी !!
# बाँध ने रोकी तो ऊपर उठ गई मैदान में
जब गिरी तो छेद पैदा कर दिए चट्टान में
बाँध क्या ली है जरा, झरनों की पायल पाँव में
थी लचक पहले भी अब कुछ और बल खाने लगी
वो नदी ...............
# चार नाले आ मिले हैं , इस भरी बरसात में
अब तो ये नदिया , नहीं रह पाएगी औकात में
तोड़कर अपने किनारे ही, उफनने क्या लगी ?
पाठ आज़ादी का वो , सागर को समझाने लगी
वो नदी ..............
# इन हवाओं ने, अभी तो प्रश्न छेड़े ही नहीं
वो समझती है , समंदर में थपेड़े ही नहीं
एक बाधा पार क्या करली, बिना पतवार के
नाव छोटी सी , भंवर पर ही तरस खाने लगी
वो नदी ............
© 2005 Lalit Mohan Trivedi All Rights Reserved
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शनिवार, 5 जुलाई 2008
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